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डी. डी. कोशांबी ने आत्ममोहग्रस्तता से निकलने की सलाह देते हुए उचित ही कहा है कि,-‘अगर कहीं कोई स्वर्णकाल जैसी चीज है, तो वह अतीत में नहीं बल्कि भविष्य में मौजूद है।’ भविष्य में असीम संभावनाएँ छिपी हैं। प्रो. अमरनाथ हिंदी भाषा के संदर्भ में यह बात पूरे दमखम से कहते हैं कि,-‘‘तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद हिन्दी ने अपना दायरा विस्तृत किया है। अपनी क्षमता में इज़ाफा किया है। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की शिक्षा के लिए माध्यम भाषा के रूप में अपनी योग्यता प्रमाणित की है। निःसंदेह इस देश का भविष्य हिन्दी के साथ जुड़ा है क्योंकि हिन्दी, देश के उन मेहनतकशों की भाषा है, आने वाला भविष्य जिनकी मुट्ठी में होगा।’’ (सदी के अन्त में हिन्दी; सम्पादकद्वय कुसुम चतुर्वेदी एवं डाॅ. अमरनाथ; पृ. 7) इस प्रकार हिंदी नवजागरण ने वैचारिक बहस छेड़ने और प्रश्न उठाने की जो परिपाटी शुरू की, वह बेमिसाल साबित हुई। दायित्व-बोध से भरी-पूरी यह परम्परा भारतेन्दु मण्डल से होते हुए ‘सरस्वती मण्डल’ और ‘मतवाला मण्डल’ के करीब पहुँची। उन दिनों आजादी के रणबांकुरों के लिए हिन्दी समन्वय, सामंजस्य एवं सम्बोधन की मुख्य भाषा थी; इसलिए उस समय के पत्रों के स्वर मुखर और दृष्टि अत्यन्त तीक्ष्ण मानी जाती थी। कहना न होगा कि ‘‘यह हिन्दी पत्रकारिता का उज्ज्वल चरित्र है जिसे तब तक विभाजित नहीं किया जा सका था, उसका मूल स्वर साहित्यिक-सांस्कृतिक ही था जिसकी आकांक्षा थी-समतामूलक समाज की स्थापना और जिसका मन्त्र था-‘प्रतिबद्ध जनतन्त्र का आदर्श स्वराज’। पत्रकारिता का यह स्वप्न हर स्तर पर व्यक्त होता रहा और विभिन्न कलारूपों पर काम करने वाले लोगों ने इस विचार को दीप की तरह जलाये रखा।’’ (साहित्यिक पत्रकारिता, ज्योतिष जोशी; पृ. 38)
आजादी के बाद के दिनों पर आएँ, तो राहुल सांकृत्यायन और आचार्य शिवपूजन सहाय दोनों के नाम अग्रपंक्ति में शुमार मिलते हैं। हिंदी नवजागरण से प्रत्यक्ष-परोक्ष ढंग से दीक्षित राहुल सांकृत्यायन अपने खुले दृष्टिकोण तथा बेबाकीपूर्ण टिप्पणियों के लिए जाने जाते थे। उन्होंने एक बार पंडित जवाहर लाल नेहरू को सीधे सम्बोधित करते हुए पत्र लिखा-‘‘पहले आप क्या थे, और अब आप क्या हैं? सच, आपके शानदार समाजवादी अतीत से आपके वर्तमान की पटरी बैठाना हमारे लिए संभव नहीं है-हम समझ नहीं रहे हैं कि इन दोनों को कैसे एक जगह रखा जाए। और अब जन संघर्षों के विरुद्ध काफी तेजी के साथ सरकारी दमन का इंजन छोड़ दिया गया है। हड़तालों को आपने एक तरह से गैरकानूनी बना दिया है। और उन लोगों को पकड़-पकड़कर जेलों में बंद किया जाने लगा है जो आपके तरीकों से भिन्न तरीके पसन्द करते हैं।’’ (साहित्यिक पत्रकारिता, ज्योतिष जोशी; पृ. 38) दरअसल, यह पत्र हिंदी पत्रकारिता के उस ओज और आभा की मिसाल है जो प्रकृतितः कशेरुकी थी अर्थात् अपनी रीढ़ की हड्डी सलामत रखते हुए तथा बिना समझौतापरस्त और अवसरवादी बने जीने वाली हिंदी पत्रकारिता। जबकि आज के अधिसंख्य पत्रकार न तो पत्रकारिता के मूल्य जानते हैं न पत्रकारीय पेशे की मान-गरिमा को संरक्षित-सुरक्षित रखने के तौर-तरीके। यही तो बात है कि राहुल सांकृत्यायन की तरह उनके पास हस्तक्षेप का साहस है और न स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ कहने-सुनने का सामथ्र्य। आचार्यात्व की इसी परम्परा में आते हैं गुणी सम्पादक शिवपूजन सहाय। हिंदी पत्रकारिता में शिवपूजन सहाय कई अर्थों में स्तुत्य हैं। पहली बात तो यही कि वह आज के अधिसंख्य पत्रकारों की तरह भाट चारण नहीं थे जिनके पास न तो भाषा है और न ही उसे सम्यक् ढंग से बरतने की तमीज़ मालूम है। इतिहास-बोध और सांस्कृतिक-साहित्यिक विवके-बुद्धि से च्यूत ऐसे पत्रकारों को शिवपूजन सहाय के कहे-सुने को बार-बार ‘इनकोड-डिकोड’ करना चाहिए क्योंकि वर्तमान पत्रकारिता जिन प्रवृत्तियों का शिकार है वे इस पेशे से जुड़े लोगों को न तो अक्लमंद बनाती हैं और न ही सेहतमंद। पूँजीपतियों के दबाव में संपादकों के अधिकारों पर होते कुठाराघात पर आचार्य शिवपूजन सहाय की चिंता गौरतलब है। वे कहते हैं-‘‘लोग दैनिक पत्रों का साहित्यिक महत्व नहीं समझते, बल्कि वे उन्हें राजनीतिक जागरण का साधन मात्र समझते हैं। किंतु हमारे देश के दैनिक पत्रों ने जहाँ देश को उद्बुद्ध करने का अथक प्रयास किया है, वहीं हिन्दी प्रेमी जनता में साहित्यिक चेतना जगाने का श्रेय भी पाया है। आज प्रत्येक श्रेणी की जनता बड़ी लगन और उत्सुकता से दैनिक पत्रों को पढ़ती है। दैनिक पत्रों की दिनोंदिन बढ़ती हुई लोकप्रियता हिन्दी के हित साधन में बहुत सहायक हो रही है। आज हमें हर बात में दैनिक पत्रों की सहायता आवश्यक जान पड़ती है। भाषा और साहित्य की उन्नति में भी दैनिक पत्रों से बहुत सहारा मिल सकता है।’’(http://bharatdiscovery.org) पत्र-पत्रिकाओं की जवाबदेह भूमिका के लिए संभावित चुनौतियाँ कितनी निर्मम हो सकती हैं। यह भान उस समय के दूरदर्शी सम्पादकों को बखूबी हो चुका था। बाबू विष्णुराव पराड़कर प्रथम हिन्दी सम्पादक सम्मेलन के अध्यक्ष पद से जो कहा था उसकी निर्लज्ज परिणति आज हमारे सामने घटित हो रही है। बकौल बाबूराव विष्णु पराड़कर, ‘‘पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंगठित कंपनियों के लिए ही संभव होगा। पत्र सर्वांग सुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे। छपाई अच्छी होगी। पत्र मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से सुसज्जित होंगे, लेखों में विविधता होगी, कल्पना होगी, गंभीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी। ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सबकुछ होगा, पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी। इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएँगे। सम्पादक की कुर्सी तक उनकी पहुँच भी न होगी।’’ (साहित्यिक पत्रकारिता, ज्योतिष जोशी; पृ. 21)

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