राहुल गाँधी इस्तीफा दें, किन्तु आगे बढें..! राजीव रंजन प्रसाद । #thematvala

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डाॅ. राजीव रंजन प्रसाद
राहुल के बोलने का ढंग बदला है। तेवर में ढीलापन नहीं है। वह भाषा की प्रोक्ति को खूबसूरती संग आजमा ले जाने में सफल दिख रहे हैं। उनमें ‘सही टाइम पर, सही बात’ कहने का हुनर दिख रहा है। वह भारतीय जनमानस के मनोविज्ञान और समाजविज्ञान से परिचित होते जा रहे हैं। व्यावहारिक स्तर पर वे समझ चुके हैं कि आज की राजनीति में ‘जैनुइन’ मुद्दे पर बहस उठाना कैसे है और अपने प्रतिद्वंद्वी को घेरना कैसे है। राहुल गाँधी सचमुच ‘डिक्टेशन मोड’ से बाहर आ चुके हैं। वह शब्दों के अर्थ ही नहीं उसके तंज-रंज को भी महसूस सकने में उस्ताद हो चले हैं। यह राहुल गाँधी में दिख रही एक नई आभा-चमक है जो आगे आने वाले दिनों में प्रभावशाली साबित होने वाला है। लेकिन फिलहाल राहुल गाँधी क्या करें, तो सबसे पहले इस्तीफा दें! अपनी जगह सचिन पायलट या मीनाक्षी नटराजन को आगे लायें; उन्हें अध्यक्ष पद सौंपे। यह चुनौतीपूर्ण है या कहें अप्रत्याशित; लेकिन जैसी हाहाकारी हार मिली है उस पर कुहराम मचाने की जगह ऐसे ही निर्णय लेने होंगे। कांग्रेस की बेहतरी के लिए जरूरी है कि कांग्रेस गाँधी के ‘सरनेम’ की परिक्रमा करने से बचें। नरेन्द्र मोदी गाँधी जी के दर्शन का उनके जन्मदिवस के 150वीं वर्षगांठ पर कायदे से कद्र-सम्मान की ‘बम्बारडिंग’ करेंगे, फिर आपको खेत हाने की जरूरत ही क्या है?

यह दौर ‘दि मिरर इमेज; और ‘स्पायरल आॅफ सायलेंस’ का है; इसे अपनी गति में घूमने दीजिए। राहुल गाँधी को किसानों के मुद्दे, बेरोजगारी की समस्या, देश में रक्षा-खरीद सम्बन्धी समझौतों में दखल, सरकारी नीतियों की ताबड़तोड़ आलोचना आदि में सर खपाने की जगह बतौर पार्टी नेता अपना पुनर्निर्माण तथा ज़मीनी प्रयास करने की आवश्यकता है। वह संवाद की संचार-शक्ति पर भरोसा करे जो अपनी प्रकृति में एकतरफा न हो। कांग्रेस को अपनी स्मृति को खंगालने तथा इतिहास को जीवंतता प्रदान करने होंगे। एक राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस को चाहिए कि वह कांग्रेस के पुरोधाओं को दीवारों के फोटोफ्रेम से बाहर लाये; उनके वैचारिकी को बिना किसी बड़बोलपन के अपने कार्यशैली में रूपांतरित करें। कांग्रेस को बाहरी सृजन की जगह आंतरिक रचावट की जरूरत पहले है।

राहुल गाँधी भूल जायें कि वे किसी किस्म के ‘हीरोइज़्म’ से जनता को रिझा लेंगे या कि उन्हें अपने पक्ष में कर लेंगे। यह मोदी से ही होगा जिसका नाम है-‘मोदी मैजिक’। मोदी-मैजिक के जानकार और कुशल रणनीतिकार यह बात पुख्ता तौर पर जानते हैं कि आजकल जनता को दूरगामी परिणाम नहीं चाहिए, दीर्घकालिक योजना नहीं चाहिए। वह ‘फास्ट फूड’ शैली में अपना कल्याण चाहने वाली है। ‘आॅडर’ के साथ ही दरवाजे पर दस्तक पाने वाली इस पीढ़ी को मार्केटजीवी फायदे चाहिए। ‘आॅफर’ के रूप में। ‘फ्री’ के रूप में। ‘महासेल’ के रूप में। टेलीविज़न पर भी उसे मूल्य और नैतिकता की कहानी नहीं चाहिए। उसे चाहिए फटाफट समाचार टाइप मनोरंजन। रहस्य, तिलिस्म और चमत्कार उलीचने वाली तकनीकी-प्रयोग। ऐसे लोगों की चाहत पूरी होने पर सरकार बन सकती है, लोकप्रिय हो सकती है। नौकरी न दें, सिर्फ ‘मैक्डोनाल्ड’ और ‘केएफसी’ का आउटलेट खुल जाने दें। बिग बाज़ार और वालमार्ट को आ जाने दें। जनता इन ऊपरी सुविधाओं के होने मात्र से स्वर्गिक आनंद का अनुभव करने लगती है। वह मान लेती है कि पिछले 70 सालों में जो नहीं हुआ अब जाकर हुआ है।

इन दिनों अब आदमी को नहीं शहर को स्मार्ट बनाने कि आवश्यकता है। अब व्यक्ति को रिझाने की जगह शहर पर जादू करने की जरूरत है। अब वास्तविक विकास नहीं, बस ‘मेकअप’ चाहिए। रंगरोगन की बयार। ऐसा फलाईओवर जिसे एक जगह बनाई जाये और पूरा देश उसको देखने को उतावला हो ले। हर काम कम हो लेकिन हो तो ‘सुपर शानदार’। जो दिखे, जो ‘माॅडल’ के रूप में स्वीकार्य हो। सरदार पटेल की सर्वाधिक ऊँची प्रतिमा एक बनी, पर गर्व उस पर पूरा देश कर रहा है। दो स्टेशनों के नाम बदलें-‘प्रयागराज’ और ‘दीनदयाल उपाध्याय’; लेकिन पूरे देश के लोगों को बदलाव का यह शुभंकर आकर्षक लगा; उन्हें मुगलों का साम्राज्य ख़त्म हो जाने का आभास हो गया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संघ की शाखा और परिक्रमा क्या शुरू हुई, पूरे देश ने मान लिया कि असल शिक्षा का केन्द्र तो अभी जगा है; उसी की लौ से पूरे देश का शैक्षणिक निर्माण हो जाएगा।

यद्यपि पाखंड एक चोला है, मुलम्मा; वह ज्यादा दिन नहीं टिकता। महाविजय की लय-धुन-तान सिर्फ संख्यातमक नहीं होने चाहिए, उनमें चिंतन-दृष्टि और मूल्य-विवेक होना भी आवश्यक है। यही इस चुनाव-परिणाम की सबसे बड़ी कमजोरी है कि उसमें आंतरिक रिक्तता बहुत है। एक तरह कि शून्यता जो रंगमंच पर अभिनय करने के लिए माकुल है; नंगे यथार्थ को साकार-मूर्त कर पाने में बिल्कुल अक्षम, असमर्थ। लेकिन इस घड़ी यह कहना खतरे से खाली नहीं है। कांग्रेस को भी एक जिम्मेदार पार्टी की भाँति ऐसे टकराहट से बचना चाहिए। उसे अपने हार को खुले मन से स्वीकारना चाहिए बजाय आत्म-मंथन या आत्म-चिंतन की नौटंकी करने के। उसे जनता को दिशा देने की अपनी भूमिका बदलनी होगी। किसानों संग चौपाल बैठाने की नौटंकी खत्म करनी होगी। उसे किसी भी मुद्दे पर सरकार की भर्तसना करने की जगह अपने पार्टी के झाड़-झंखाड, नोई, टूटते पलस्तर, बदरंग होते दरो-दिवार आदि को संभालने की जरूरत पहले है। जनता अभी ‘पाॅवर इमेज’ के पीछे है, यदि मोदी सचमुच ही झूठ बा ँचने वाले जादूगर होंगें, तो जनता उनके सम्मोहन से बाहर निकलेगी। काला-जादू की भी एक मियाद होती है। यदि मोदी महज मिथ है, तो उसे अपनेआप टूटने दीजिए; अन्यथा भीड़-तंत्र विपक्षी नेताओं की बची-खुची इज्जत भी उतार लेगी।

जनता यदि बेवकूफ नहीं है, तो वह बेकसूर भी नहीं है। ग़लत निर्णय करने पर सजा उसे खुद भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए। यदि वह अपने समय के सबसे समझदार व्यक्ति को चुनी है जिसकी सेना कृष्ण की पांडव-सेना है , तो देश को फिर गफ़्लत किस बात की। आम-आदमी की समस्या यूँ ही छू-मंतर हो जाएगी। उनका सोचा सब ऐसे ही सच हो जाएँगे। उसके सपने पूरे ही नहीं होंगे, बल्कि सपनों से अधिक अप्रत्याशित उसे मिलेगा ही मिलेगा। यदि नरेन्द्र मोदी फ़कीर हैं, तो उनके पार्टीदार तो महाफ़कीरों की ज़मात है जो जनता से इतना इश्क़-मुहब्बत करती है कि वह अपने खाने से पहले उनके बारे में सोचेगी। अपने जीने से पहले जनता-जनाइर्दन के जीने की फिक्र करेगी।

अतः राहुल अब अपनी पार्टी देखें, देश सम्भालने वाला कामदार और असल चौकीदार आ चुका है। मंत्रमुग्धी जनता की भाषा में मान भी लें कि उसने पिछले पाँच सालों में इतना काम किया है जो कि पिछले 70 सालों तक काबिज़ कांग्रेस सरकार नहीं कर सकी; तो मान लेने में गुरेज कैसा!  नई सरकार अगले पाँच साल तक इतना देश-कल्याण करेगी कि कांग्रेस को और कुछ करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। अतएव, राहुल गाँधी या उनकी पार्टी को यह बताने की जरूरत नहीं है कि नरेन्द्र मोदी की पार्टी द्वारा बटोरी गई इफ़रात शोहरत नकली है। यह कहने का कोई मतलब नहीं है कि-बाहरी ऋण पर देश का खेखला होना तय है; फर्जी खरीददारी से देश का नुकसान हो रहा है; संस्थाओं की प्रतिष्ठा पर कुठाराघात हो रहा है आदि-आदि। कौन नहीं जानता कि कर्ज की सरकार अपना लूटिया स्वयं डूबोती है। अविवेकी निर्णय से कुल्हाड़ी पर टाँग अपनी ही पड़ती है। चाहे सरकार के सभी ‘पोजिशनधारी’ कितने भी हरे-भरे और तरोताजा दिखें। भारत की अर्थव्यवस्था की आंतरिक चूलें अगर हिली हुई हों, तो विकासमान आडम्बर अंततः भरभरा कर गिर ही जाएगा। राहुल गाँधी या कांग्रेस दोनों में से किसी को यह प्रचारित करने की जरूरत नहीं है कि मोदी सरकार और उनके लोग ग़लत हैं। वह बस अपनी ग़लती से सबक ले। कांग्रेस को अपने किए की सजा मिल रही है। कल जनता को भी मिलेगी यदि उसने सचमुच ग़लत सरकार को चुना है।

(लेखक ने युवा राजनीतिज्ञ संचारकों पर शोध-कार्य किया है।)

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