सह-अस्तित्व, भाषा शिक्षा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना

Navchetana
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अपनी पहचान, अपनी संस्कृति, अपने साहित्य और महान ज्ञान-विज्ञान एवं दर्शन की परम्पराओं के प्रति सजग एवं सचेत समाज इनके संरक्षण एवं विकास के प्रति उसी तरह सक्रियता एवं दायित्वबोध से चालित होता है, जैसे एक चिड़िया घोसले में पल रहे अपने बच्चों के प्रति। दर्शन, साहित्य, कला एवं ज्ञान-विज्ञान के प्रति यही दायित्व हमारी भाषा निभाती है। जहाँ हमारा समस्त सांस्कृतिक, सामाजिक, वैचारिक एवं शैक्षिक अस्तित्व संरक्षित होता है और उसी के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। वह न सिर्फ हमारे सामाजिक सह-अस्तित्व का आधार है बल्कि वैश्विक उपस्थिति की आधारभूमि भी है। किसी भी राष्ट्र की वैश्विक मंच पर समकालीन उपस्थिति सिर्फ उसकी क्रय क्षमता, तकनीकि विकास, उपलब्ध बाजार पर निर्भर नहीं करती बल्कि उस राष्ट्र की सांस्कृतिक समृद्धि वैश्विक मंच पर मानवीय सभ्यता के विकास में उस राष्ट्र के महानतम योगदान से तय होती है। जिसे हमारे रसायनशाष्त्र के महान विद्वान एवं ‘हिन्दू रसायन का इतिहास’ जैसी महान पुस्तक के लेखक डॉ. प्रफुलचन्द्र रे के उदाहरण और योगदान से समझ सकते हैं। डॉ. रे ने जब हिन्दू रसायन का इतिहास नामक पुस्तक लिखी तो विश्व रसायन के क्षेत्र में भारतीय उपलब्धियों को देखकर चौंक गया। डॉ.रे की रूचि भौतिक एवं रसायन विज्ञान में थी तथा विदेश में उन्होंने इसकी शिक्षा आंग्ल भाषा में प्राप्त की थी। जो डॉ. रे के लिए दूसरी भाषा थी लेकिन वहां के स्थानीय लोगों के लिए वह उनकी अपनी भाषा थी। जब वह भारत वापस लौटे तो उन्होंने विज्ञान की शिक्षा अपनी मातृभाषा में प्रदान किये जाने की वकालत की तथा जीवन पर्यंत उन्होंने अपना लेखन, अध्यापन आदि समस्त कार्य अपनी मातृभाषा बांग्ला में किया। इसका महत्व इस तथ्य से रेखांकित किया जा सकता है कि जब विज्ञान की पुस्तकें किसी भी भारतीय भाषा में लगभग न के बराबर थीं। इन महान प्रयासों ने ही स्वतंत्रता के उपरांत एक राष्ट्र के रूप में हमारा मार्ग प्रशस्त किया। यह दुखद है कि भारतीय भाषाओं में विज्ञान की पुस्तकों का सर्वथा अभाव आज तक बना हुआ है, जिसे ध्यान में रखते हुए हमारी नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति कहती है कि “उच्चतर गुणवत्ता वाली विज्ञान और गणित में द्विभाषी पाठ्य-पुस्तकों और शिक्षण-अधिगम सामग्री तैयार करने के सभी प्रयास किये जायेंगे ताकि विद्यार्थी दोनों विषयों पर सोचने और बोलने के लिए अपने घर की भाषा/मातृभाषा और अंग्रेजी दोनों में सक्षम हो सके।(रा.शि.नी.4.14) 


कोठारी आयोग ने 1964 में राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में जब भाषा में महत्व को रेखांकित करते हुए अपनी संस्तुतियां प्रदान की तो आवश्यकता भाषा के प्रति औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होकर उन संस्तुतियों को राष्ट्र हित में लागू किये जाने की थीं। कोठारी आयोग का स्पष्ट मत था कि “भारत के सांस्कृतिक एवं शैक्षिक विकास के लिए भाषा और साहित्य का विकास अनिवार्य है। यदि क्षेत्रीय भाषाओँ का विकास नहीं किया गया तो लोगों की रचनात्मक उर्जा मुक्त नहीं होगी, शिक्षा के स्तर में सुधार नहीं हो सकेगा, ज्ञान का प्रसार लोगों तक नहीं हो सकेगा, आमजन और विद्वतजन के बीच खाई बढ़ती चली जाएगी।”(कोठारी आयोग, वोल्यूम 2) हमारी रचनात्मक उर्जा की मुक्ति हमारी मातृभाषा में ही संभव है, हमारी मुक्ति हमारी भाषा की मुक्ति है, हमारे अस्तित्व एवं पहचान की निर्मिती है। कहना न होगा कि हमें विदेशी सत्ता से तो मुक्ति मिल गयी लेकिन औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति नहीं मिल सकी और भाषा के प्रति हमारा मैकालेवादी रवैया बना रहा और भारतीय भाषाओँ के साथ-साथ हमारी हिंदी भी अपने ही घर में गैर बनी रही और अंग्रेजी के सामने लचर रही।


    आज तक देश के कई हिस्सों में हम हिंदी, जिसे एक ऐसी भाषा के रूप में विकसित किया जाना था ‘जो भारत की समग्र संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का वाहक हो सके’(कोठारी आयोग) नहीं ले जा सके हैं। वह केवल उत्तर भारत की भाषा मान ली गयी। जबकि हमारे राष्ट्र निर्माताओं से उसे एक ऐसी भाषा के रूप में चिन्हित किया था जिसके भीतर उत्तर से लेकर दक्षिण तक की समस्त भारतीय संस्कृति अपनी क्षेत्रीय आभा के साथ प्रस्फुटित होकर समस्त राष्ट्र की रगों में एक ऐसी भाषा के माध्यम से संचरित हो सके, जिसे हम संपर्क भाषा कह सकें। जिस भाषा में देश का कोई भी भाषा-भाषी आपस में संवाद कर सके। इसके लिए हिंदी भाषा को शिक्षा के माध्यम से दक्षिण के राज्यों में प्रोत्साहित किया जाना था, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने जब भारतीय एकात्म की अवधारणा कल्पित की तो हिंदी भाषा उसे प्राप्त करने का एक महत्वपूर्ण उपकरण थी। उनका मानना था कि ‘भाषा जानता को जोड़ने, विचारों की अभिव्यक्ति करने तथा संस्कृति को उत्त्क्रांत करने का साधन है। हमारे इस विशाल देश में भाषाएँ अनेक हैं लेकिन सब की संस्कृति एक ही है..भाषा किसी एक प्रान्त का विषय न होकर सारे देश का है और राष्ट्रीय एकात्म को आगे बढ़ाने का एक माध्यम है।’ लोकसभा में राजकाज की भाषा का प्रश्न उपस्थित हुआ तो वह संवैधानिक स्थान हिंदी को दिया गया। किन्तु इस प्रावधान के साथ कि पंद्रह वर्षों तक अंग्रेजी भी राजकाज की भाषा बनी रहेगी। हमारी सरकारों का यह दायित्व था कि उन पंद्रह वर्षों में हिंदी और प्रादेशिक भाषाओँ का विकास करती, परन्तु दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका और अंग्रेजी आज हमारी समस्त भारतीय भाषाओँ के सामने एक विकरण संकट के रूप में खड़ी हो चुकी है। पंडित दीन दयाल उपाध्याय कहते हैं कि “अंग्रेजी चली गयी तो उसका स्थान केवल हिंदी नहीं, सारी प्रादेशिक भाषाएँ लेंगी। अंग्रेजी के यहाँ बने रहते देश की अन्य कोई भाषा अपना विकास नहीं कर पायेगी। तमिल, बांग्ला आदि भाषाओँ को उनके राज्यों से हिंदी ने नहीं अंग्रेजी ने ही निकाल बाहर किया है।”  


कोठारी आयोग ने जो त्रिभाषा फार्मूला दिया था उसमें; माध्यमिक स्तर पर, राज्य सरकारों को त्रि-भाषा फार्मूला अपनाना और उसे सख्ती से लागू करना था। हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक आधुनिक भारतीय भाषा, जैसे दक्षिणी भारत की भाषाओं में से एक का अध्ययन शामिल था, और गैर-हिंदी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के साथ हिंदी का अध्ययन शामिल किया गया था।  हमारी राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक अस्मिता एवं विविध संस्कृतियों के आपसी समावेशन का यह महान कार्य आज तक उपेक्षित ही कहा जा सकता है जिसे नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति (2020) ने पुनः परिभाषित किया तथा नए सिरे से इसे लागू करने को लेकर अपनी प्रतिबद्धतता माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में जाहिर की। 


हमारी नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति कहती है कि : संवैधानिक प्रावधानों, लोगों, क्षेत्रों, और संघ की आकाँक्षाओं और बहुभाषावाद और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने की जरुरत को ध्यान में रखते हुए त्रिभाषा फार्मूले को लागू किया जाना जारी रहेगा। हालाँकि तीन भाषा फार्मूले में काफी लचीलापन रखा जायेगा और किसी भी राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। (इसे हम आजकल भाषाओँ के थोपे जाने संबंधी चल रहे विवाद व आरोप के परिप्रेक्ष्य और हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मूल भावना के सन्दर्भ में जरुर देखें) बच्चों द्वारा सीखी जाने वाली तीन भाषाओँ के विकल्प राज्यों, क्षेत्रों और निश्चित रूप से छात्रों के स्वयं के होगे, जिसमें तीन में कम से कम दो भाषाएँ भारतीय भाषाएँ हों। विशेष रूप से जो छात्र तीन में से एक या अधिक भाषा को बदलना चाहते हैं, वे ऐसा ग्रेड 6 या 7 में कर सकते हैं, लेकिन ऐसा करने के लिए उन्हें तीनों भाषा में, जिसमें एक भारतीय भाषा को साहित्य के स्तर पर अध्ययन करना शामिल है, माध्यमिक कक्षाओं के अंत तक बुनियादी दक्षता हासिल करके दिखाना होगा।।........नीति आगे कहती हैकि दुनिया भर के कई विकसित देशों में देखने को मिलता है कि अपनी भाषा,संस्कृति और परम्पराओं में शिक्षित होना कोई बाधा नहीं है, बल्कि वास्तव में शैक्षिक,सामाजिक और तकनीकि प्रगति के लिए इसका बहुत बड़ा लाभ ही होता है। भारत की भाषाएँ दुनिया में सबसे समृद्द, सबसे वैज्ञानिक, सबसे सुन्दर और सबसे अभिव्यंजक भाषा में से है, जिसमें प्राचीन और आधुनिक साहित्य के विशाल भंडार हैं....सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकीकरण की दृष्टि से सभी युवा भारतियों को अपने देश की भाषाओँ के विशाल और समृद्ध भण्डार और इसके साहित्य के खजाने के बारे में जागरूक होना चाहिए।(रा.शि.नी.4.15)  इस बात पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है कि जहाँ कोठारी आयोग ने त्रिभाषा फार्मूले को ‘सख्ती से लागू’ किये जाने की बात की थी वहीं राष्ट्रीय शिक्षा नीति इसे ‘पर्याप्त लचीलेपन’ के साथ लोकतांत्रिक तरीके से क्षेत्रीय अस्मिताओं का सम्मान करते हुए, उसे उस भाषा में स्थान देते हुए लागू करना चाहती है।


हमारी भाषाओं में ज्ञान-विज्ञान, दर्शन और सिद्धांत का विशाल भण्डार मौजूद है जिसका अवगाहन वर्तमान विश्व को कई मोर्चों पर नयी दिशाएं दे सकता है। उससे परिचित, उसमें शिक्षित हमारा युवा वैश्विक संभावनाओं के नए द्वार खोल सकता है। 1996 में यूनेस्को द्वारा शिक्षा पर महत्वपूर्ण डेलर्स कमीशन रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी। इस कमीशन की रिपोर्ट जिस चार महत्वपूर्ण स्तंभों पर टिकी है उसमें पहला है जानने के लिए अधिगम (सीखना), दूसरा है करने के लिए अधिगम, तीसरा है साथ रहने के लिए अधिगम, चौथा है होने के लिए अधिगम। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि यह रिपोर्ट वैश्विक शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व के लिए ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की हमारी सांस्कृतिक परिकल्पना को विश्व के लिए आधार बनाती है, जहाँ से वैश्विक नागरिकता की भावना का जन्म होता है। यही भावना हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का आधार है जो अखिल भारतीय स्तर पर सभी संस्कृतियों, अस्मिताओं, भाषाओँ का समावेशन करते हुए भारतीय आत्म की निर्मिती करते हुए वैश्विक नागरिक का निर्माण करेगी; जैसे डेलर रिपोर्ट विश्व की सभी संस्कृतियों के आपसी सह-अस्तित्व से विश्व नागरिकता का निर्माण वसुधैव कुटुम्बकम के माध्यम से करना चाहती है। हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति अपने विजन में कहती है “इस राष्ट्रीय शिक्षा का विजन भारतीय मूल्यों से विकसित शिक्षा प्रणाली है जो सभी को उच्चतर गुणवत्ता शिक्षा उपलब्ध कराकर और भारत को वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाकर भारत को एक जीवंत और न्यायसंगत ज्ञान समाज में बदलने के लिए प्रत्यक्ष रूप से योगदान करेगी। नीति में परिकल्पित है कि हमारे संस्थानों की पाठ्यचर्या और शिक्षविधि छात्रों में मौलिक दायित्वों और संवैधानिक मूल्यों, देश के साथ जुड़ाव और बदलते विश्व में नागरिक की भूमिका और उत्तरदायित्वों की जागरूकता उत्पन्न करे। नीति का विजन छात्रों में भारतीय होने का गर्व न केवल विचार में बल्कि व्यवहार, बुद्धि और कार्यों में और साथ ही ज्ञान, कौशल, मूल्यों और सोच में भी होना चाहिए जो मानवाधिकारों, स्थायी विकास और जीवनयापन तथा वैश्विक कल्याण के लिए प्रतिबद्ध हो, ताकि वे सही मायनों में वैश्विक नागरिक बन सकें।”  


हमारी शिक्षा नीति अपने प्राक्कथन में कहती है “प्राचीन और सनातन भारतीय ज्ञान विचार की समृद्ध परम्परा के आलोक में यह नीति तैयार की गयी है। ज्ञान, प्रज्ञा और सत्य की खोज को भारतीय विचार परम्परा और दर्शन में सदा सर्वोच्च मानवीय लक्ष्य माना जाता था....जीवन की तैयारी के रूप में ज्ञान अर्जन नहीं बल्कि पूर्ण आत्मज्ञान और मुक्ति के रूप में माना गया था। कहना न होगा कि यह तब तक संभव नहीं जब तक हमारी भाषाएँ हमारे कंठ से, बिना किसी दबाव व ग्लानि के मुक्त स्वर में हमारे सांस्कृतिक सार के साथ अभिव्यक्त न हों। इस आत्मज्ञान, मुक्ति और भारतीय एकात्म के हमारे सांस्कृतिक सार को गुरुवर रविन्द्रनाथ टैगोर ने ‘गीतांजलि’ में वाणी दी थी:  


जहाँ मन भयमुक्त हो और सिर ऊँचा हो 

जहाँ ज्ञान स्वतंत्र हो

जहाँ दुनिया संकीर्ण घरेलू दीवारों द्वारा टुकड़ों में विभाजित न हो 

जहाँ शब्द सत्य की गहराइयों से निकलते हों 

जहाँ अथक प्रयास पूर्णता की ओर अपनी भुजाएँ फैलाता हो 

जहाँ तर्क की स्पष्ट धारा मृत आदत के उदास रेगिस्तानी रेत में अपना रास्ता न खो चुकी हो 

जहाँ मन को आप निरंतर व्यापक विचार और क्रिया की ओर ले जाते हों

स्वतंत्रता के उस स्वर्ग की ओर, मेरे पिता, मेरे देश को जागृत करो। 

जो अब हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, भाषा नीति का सार और लक्ष्य है।


प्रो. शशिकला वंजारी 

(कुलपति, नीपा)



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