Part two : भाषा में बोलना एक चीज़, जानना और जीना बिल्कुल दूसरी चीज़ : प्रो. अवधेश नारायण मिश्र

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(‘संचार की संस्कृति’ विषय पर प्रो. अवधेश नारायण मिश्र से राजीव रंजन प्रसाद की बातचीत पर आधारित-2)

आधुनिक बाज़ार की आदमखोर संस्कृति ने लोगों को उनकी प्रगतिशील परम्परा और संस्कृति से अलगा दिया है। अब लोग अपने हित-लाभ को लेकर अधिक सजग, सावधान और सचेत हैं। उन्हें सरकारी भाषा में जो पाठ पढ़ा दिया जा रहा है, वे रट्टू तोता की भाँति उसी को सुने-बोले-माने जा रहे हैं। आधुनिकता का जो नवसंस्करण इन दिनों दिखाई दे रहा है उनमें सचेतन मूल्यों का ही कोई अता-पता नहीं है। अर्थात् आज की आधुनिकता प्रश्नवाचकता, खुलापन, बहुलता, ज्ञानोत्पादन, लोकतांत्रिकता, निरन्तरता, व्यापकता आदि से कोसों दूर हैं।

उपभोक्तावादी संस्करण ने भारतीय जन-चेतना तथा जन-पक्षधरता एवं ख़ासकर भाषा को पूरी तरह विकृत तथा विरूपित कर रखा है। बाज़ार-पूँजीकरण के फेर में फँसी जनतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार तक ख़तरनाक कुचक्र रचती है। इस सम्बन्ध में नवारुण भट्टाचार्य की मुख्य चिंता यही थी, ‘मनुष्य को जागरूक न होने दिया जाए, तो सरकार के अपने लाभ हैं। इसमें सरकार टेलीविज़न का भयानक ढंग से अपने पक्ष में इस्तेमाल कर रही है। एक आम-आदमी शाम को थक कर घर पहुँचकर टेलीविज़न खोलता है। वह नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है। टेलीविज़न को खोलना ड्रग लेना है। यह दूसरे ड्रग्स हेरोइन, चरस और अफीम से भी ज्यादा ख़तरनाक है और इसका चरित्र दोहरा भी है। वह एक तरफ़ इन चीजों को बढ़ावा दे रहा है। जैसे-बाज़ारीकरण, अपसंस्कृति आदि, तो दूसरी तरफ दबे मुँह आलोचना भी करेगा। और मजे की बात है कि इस आलोचना के पीछे भी उसकी बाज़ारू मानसिकता है।' 

दरअसल,'व्यवस्था की इस प्रवृत्ति को व्यापक संदर्भों में देखने-समझने की जरूरत है। सूचनाओं के विश्लेषण की क्षमता का विकास, उन पर तर्क कर सकने की क्षमता का विकास अंततः व्यवस्था को ही चुनौती देगा। किशोर होते बच्चे और युवा होते किशोर अगर तर्क करने लगें, विश्लेषण करने लगें तो सूचनाओं में अंतर्निहित वे तथ्य भी उघड़ सकते हैं जो व्यवस्था नहीं चाहती। तर्क करता युवा, विश्लेषण करता युवा व्यवस्था, यानी कि सिस्टम के लिये खतरा हो सकता है। हद से ज्यादा वस्तुनिष्ठता इन खतरों को कम करती है।'

अतः भूमण्डलीकृत बाज़ार से घिरे भारतीय जनमानस को अपनी भाषा पर किए जा रहे बहुतरफा हमले से बचाव करना होगा तथा वर्चस्वादी गिरफ़्त से बाहर निकलना होगा। इस बदलाव का सारा दारोमदार नई पीढ़ी पर है। उसे ही स्वतन्त्रचेता भारतीय मानस की भाषाओं का आदर करना होगा, उनकी प्रतिष्ठा को पुनर्बहाल करना होगा। कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर का कहा मानें- ‘मैंने बहुत दुनिया देखी है। ऐसी भाषाएँ हैं जो हमारी भाषाओं से कहीं कमजोर हैं। परन्तु उनके बोलने वाले अंग्रेजी विश्वविद्यालय नहीं चलाते। हमारे ही देश में ये लोग परमुखापेक्षी हैं।...देशी भाषाओं को कच्चे युवकों की जरूरत है। लग पड़ोगे तो सब हो जाएगा। हिन्दी के माध्यम से तुम्हें ऊँचे से ऊँचे विचारों को प्रकट करने का प्रयत्न करना होगा। क्यों नहीं होगा, मैं कहता हूँ-जरूर होगा।'

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