आधे-अधूरे तैयारी से सोशल रैंगिंग करती ‘आर्टिकल 15’

Desk
0
कहीं भी गहराने नहीं दिया गया है संवेदना को। जिस जमात की कहानी है उनके ऊपर कैमरा पैन करने या क्लोज-अप में जाने से, उनकी चीत्कार सुनने से, उनके रहवास और जीने के आलमों को वास्तव में खोजने-जानने और समझने से  निर्देशक अनुभव सिन्हा ने अपने को हरसंभव बचाया है। 

दरअसल, उठलू-चलू की तरह भागती है स्टोरी दृश्य-दर-दृश्य। निश्चय ही कई पात्रों ने जान फूँकी है फिल्म में; पर वे सब अंत में बजते गाने की तरह ‘फैंसी-लीला’ के शिकार हो जाते हैं। मुद्दा उठना सही है; क्योंकि इससे समाज का सनकी और विद्रूप चेहरा सामने आता है; लेकिन इससे जातिवाद के गोजरों को ही अंततः हँसी ठठाका करने का अवसर मिलता है। बाकी तो जातिदारों के प्रत्यक्ष-परोक्ष बर्बरताओं के कारण लोग रोज मर रहे हैं। यह और बात है, उनके मरने की एवज में ही हमें जीने के अवसर मिल रहे हैं, सैलरियाँ हाथ लग रही हैं।

चलिए, कहानी का हीरो अंत तक जिंदा रहा, क्योंकि वह जिस जाति से बिलांग करता है उसका कैची लाइन जो मुझे सूझता है; वह है-‘टाइगर जिंदा है!’

रजीबा ऐसी फिल्मों पर ताली बजाता है, तो उसकी आवाज ‘थर्ड जेंडर’ के जमात जैसी ही बेबस और लाचार होगी।

डॉ.राजीव रंजन के फेसबुक वॉल से..
Tags

एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)